Google+ Followers

Sunday, 10 September 2017

हो श्रद्धा न हो आडम्बर



थे श्रेष्ठ सदा ही पिता हमारे
कर्तव्य निभाकर गए वो सारे
मन की व्यथा भरा नहीं था
टूट-टूटकर उर बिखरा था
भाई भी जग को छोड़ गये
अनंत पीर में डूबो गये
चीत्कार ह्रदय कर रहा निरंतर
स्मृति-हीन हुये ना पलभर
नयन-नीर बह उठता अक्सर  
समय ने दी सांत्वना बढ़कर
उॠण नहीं होगा ये जीवन
महसूस उन्हें करते हैं कण-कण
है भक्ति-भाव भरा अंतर्मन
तन-मन सारा करता वंदन
हो श्रद्धा ना हो आडम्बर
पत्र-पुष्प सुमन-दल लेकर
पार्वण-श्राद्ध करता है जो नर
पितृ-आशीष पाता जीवन-भर.     
      

Sunday, 30 July 2017

कवि तुम गीत लिखो कुछ ऐसा



कवि तुम गीत लिखो ऐसा
अक्षर-अक्षर मुखरित होकर
बोले प्रेम की भाषा , कवि तुम .......
कला वही सच्ची कहलाती
जिस चिंतन को चित्त अपनाती
उर-स्पंदन के जैसा , कवि तुम .......
जो झकझोरे भावुकता को
जागृत कर दे मानवता को
जो मनुज में भर दे आशा , कवि तुम .......
इंद्रधनुष सा मन हर्षा दे
युग-युग जलकर राह दिखा दे
उन दीपशिखा के जैसा , कवि तुम .........
मौन व्यथा की स्वर बन जाये
राग करुण बन नीर बहाये
दे व्याकुलता में दिलासा , कवि तुम .........
कुंठित मन को प्रेरित कर दे
नयी बोध नयी दृष्टि भर दे
भर दे नव अभिलाषा , कवि तुम .........        

Saturday, 17 June 2017

उन श्रेष्ठ पिता के चरणों



देकर अपने नाम सदा ही
जिसने हमें तराशा
इक कोमल स्पर्श को पाकर
तन-मन जिसका हर्षा.
दृष्टि में कोमलता भरकर
जिसने सिखाई भाषा
देख के इक सुन्दर स्मित को
जिसने बोई आशा.
जिनके भावों के तूली से
भावुकता का प्रवाह हुआ
जिनके मौन संवेदन से
रोम-रोम आबाद हुआ.
ये देह-प्राण उर-स्पंदन
जिनके लिए है रोता
उन श्रेष्ठ पिता के चरणों में
झुकता रहेगा माथा.         

Sunday, 11 June 2017

बाल-कविता



बाय-बाय नानी बाय-बाय दादी
ख़त्म हुयी सारी आजादी...
इतनी सुन्दर इतनी प्यारी
बीत गयी छुट्टी मनोहारी
खुल गये स्कूल ख़ुशी है आधी
खत्म हुयी सारी आजादी ...
तेज धूप में दौड़ लगाते
मीठे आम रसीले खाते
अब बस्तों ने नींद उड़ा दी
ख़त्म हुयी सारी आजादी...
बहुत हुयी मौजे मनमानी
अनगिनत मस्ती शैतानी
अब उमंग पढने की जागी
ख़त्म हुयी सारी आजादी ...